बन पाये कैलाश नहीं - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
बन
पाये कैलाश नहीं
तुम
कोरे कंकर ही
निकले बन पाये
कैलाश नहीं।
ऐसे- ऐसे
कर्म किये हैं
रहा तनिक विश्वास
नहीं।
कितने सपने
देखे लेकिन कोई
सच्चा हुआ नहीं।
बहुत इलाज किया वंध्या का लेकिन बच्चा हुआ नहीं।
बड़े- बड़े झांसों
से लूटा हम
तो भोले-भाले हैं।
जिनको दूध
घुला समझा वो
पहले से भी काले
हैं।
तुम भी क्रूर
शिकारी निकले हो सकते आकाश नहीं।
तुम कोरे
कंकर ही
निकले बन पाये कैलाश
नहीं ।
तट डरने
लग गया बहुत
ही अब मक्कार सफ़ीने से।
खून बहा
जनता का तुमने
धोया उसे पसीने
से।
सावन जिसको
समझा हमने वह जेठ का
महीना था।
शीशा निकला
हमने जिसको समझा शुद्ध नगीना था।
क्या तुमने
भी रामराज्य को दे डाला बनवास नहीं।
तुम कोरे
कंकर ही निकले बन पाये
कैलाश नहीं।
सूखों को दे रहा निमंत्रण छलिया मौसम बरसाती।
बुरी नजर
से लगा देखने
दुलहन को हर
बाराती ।
‘करनी’ का
चोला उतारकर पहना ‘कथनी’का चोगा ।
सत्ता में
यदि जमे अँधेरे
दोष तुम्हारा ही
होगा ।
पतझड़ के मौसम हो तुम
भी हरे-भरे मधुमास नहीं।
तुम
कोरे कंकर ही
निकले बन पाये कैलाश नहीं।
पीड़ा की अभिव्यक्ति कर रहा
जो तन-मन पर सहता हूँ।
मुझको भय लगता
न किसी से सच्ची-सच्ची कहता हूँ।
मरघट के क्रन्दन में
कैसे बन्दनवार
सजाऊँ मैं।
अब तक मस्तक मिला न ऐसा जिस पर तिलक लगाऊँ मैं।
यह
कुर्सी जागीर नहीं है
क्या तुमको अहसास नहीं।
ऐसे
कर्म किये हैं
तुमने रहा तनिक
विश्वास नहीं।
पतझड़ कब तक
रोक सकेगा आती
हुई बहारों से।
आखिर
गिरना ही होगा इन गली- सड़ी दीवारों को।
कब करता
इतिहास माफ़ झूठे
मक्कार सवेरों को।
सूरज से
पिटना ही पड़ता
है गद्दार अँधेरों
को ।
कफ़न
उढ़ाया जिस पर तुमने
ऐसी कोई लाश नहीं।
तुम
कोरे कंकर ही
निकले बन पाये
कैलाश नहीं।
कैसे आम
मिलेंगे उनको सदा
शूल जो बोयेंगे।
मजबूरों पर
हँसने वाले आखिर इक दिन
रोयेंगे।
बुद्धिमान हो इसीलिए संकेतों
में समझाता है।
बहुत दुखी
हो गया ‘मनीषी’ रोते -रोते गाता है।
तुम केवल
रह गए पृष्ठ
ही बन पाए
इतिहास नहीं।
ऐसे- ऐसे कर्म किए हैं
रहा
तनिक विश्वास नहीं।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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