कुल्हाड़ी सारी दुनिया - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’

                                कुल्हाड़ी    सारी  दुनिया

   खिलाता  तू  सभी  को   खिलाड़ी  सारी   दुनिया
  सिखाता   है   सलीका   अनाड़ी   सारी   दुनिया
   देता  है  सरगम  तू  सबको नहीं  बांटता  सिसकी
   नहीं दुखाई आँख किसी  की तुमने इसकी उसकी
 तुमने   चमन   लगाये   लोगों  ने   फेंके   अंगारे
   देता   है   सबकुछ  फिर  भी दुनिया वाले बेचारे
    बनाता  तू  सभी  कुछ  कुल्हाड़ी  सारी  दुनिया---
                                 खिलाता  तू  सभी  को---
  हम  तुमको  पहचान  न  पाए कितने मूढ़  अभागे
  समय- समय  पर  रहे जगाते  किन्तु नहीं हम जागे
 पाप-पंक    में   लिप्त  रहे   नित  सोये-खोये-रोये
  पाते फूल  कहाँ  से  हमने  जबकि  शूल  हैं  बोये
  तू  सच्चा  जौहरी  है,  कबाड़ी   सारी  दुनिया---
                           खिलाता  तू  सभी  को---
कोई  कितना बने  सयाना  पर  सबकी सीमा है
कोई   कितना  तेज  चले  तेरे  आगे  धीमा  है
तुमको  धोखा  देने  वाले  खुद  को धोखा देते
अन्त समय में शरण सभी जन आकर तेरी लेते
तू  पीछे-पीछे   हांके  अगाड़ी  सारी  दुनिया ---
                            खिलाता  तू  सभी  को--- 

कभी  नहीं अन्याय हुआ  है  तेरे न्यायालय में
कमी नहीं है किसी बात की दैहिक देवालय  में
शरण  तुम्हारी  आये पूरा  हर  सपना  होता है
तुम्हे  समर्पित किये पराया भी  अपना होता है
  ढके  है तू सभी  विधि  उघाड़ी  सारी दुनिया ---
                           खिलाता  तू  सभी  को---

  सब कुछ चले सुचारु  रूप से कड़ा नियम है तेरा
 कितनी सुन्दर  सृष्टि  रचाई  कैसा  चतुर  चितेरा
   हम  भोले  हैं अगर न करते अर्पण संध्या –वन्दन
  हम  हैं  पद  की धूल और तू  है  माथे का चन्दन
  ये   काल  है   सरौता  सुपाड़ी  सारी  दुनिया ---
                             खिलाता  तू  सभी  को---
  सच्चे हो आराध्य  तुम्हीं  पत्थर तो बस पत्थर है
  भीम भयंकर  प्रलयंकर  दिनकर तुम पर निर्भर  है
   सबके  संबल  घायल पायल आंचल गंगाजल में
   कण-कण  में है वास तुम्हारा धरती नभ,बादल में
                    पिता   है   तू ‘मनीषी’  लबाड़ी   सारी   दुनिया

  खिलाता तू सभी को को खिलाड़ी सारी दुनिया
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
 [ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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