झगड़ा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
झगड़ा
अलग- अलग खेमे
हैं सबके अपना- अपना
वाद है ।
इसीलिए धरती पर
बढ़ता नित प्रति
वाद विवाद है ।
कोई कहता
भोजन में तो
खीर बड़ी ही
श्रेष्ठ है ।
कुछ
कहते यह वायु
दोष करती इस
कारण नेष्ठ है ।
कोई कहता
बर्फी देवी मिष्ठान्नों
की प्राण हैं ।
ऐसे भी
कुछ रसगुल्ले का
देते लोग प्रमाण
हैं ।
नहीं झगड़ना अच्छा
हर जिह्वा का अपना स्वाद
है ।
अलग- अलग खेमे
हैं सबके अपना- अपना
वाद है ।
वैर भाव
के बीज दिलों
में जरा प्रेम
का रंग नहीं ।
लड़
पड़ते छोटी बातों
पर जीने का
भी ढंग नहीं ।
विरह
व्यथा ही मुख्य यहाँ पर बजे मिलन का चंग नहीं ।
भिन्न –भिन्न सबके दर्शन
हैं मिलकर रहते
संग नहीं ।
यहां प्रेम रँग
--- नहीं रक्त
से भरा हुआ
आह्लाद है ।
अलग- अलग खेमे
हैं सबके अपना- अपना
वाद है ।
कोई द्वैत मानता
है कोई अद्वैत
मान बैठा ।
निराकार इक कहता
है दूजा साकार
जान बैठा ।
कोई राधा, सीता
पूजे कोई कान्हा, राम को ।
कोई माने दुर्गा,
काली केवल कोई
नाम को ।
कोई कहता यहां प्रेम का
रस्ता ही आजाद है ।
अलग- अलग खेमे
हैं सबके अपना- अपना
वाद है ।
तीन सनातन सत्ताएं
हैं वेद यही
बतलाता है ।
ईश्वर होता वृद्ध
मरे ना जन्म धार के
आता है ।
आत्मा और प्रकृति का भी तो विलय
नहीं हो पाता है ।
सत्कर्मों से जीव किन्तु कुछ
बंधी मुक्ति पा जाता है ।
राग, द्वेष से बढ़ा ‘मनीषी’
दंगा और फसाद
है ।
अलग-
अलग खेमे हैं सबके
अपना- अपना वाद है ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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