बचपन नहीं रहा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
बचपन नहीं
रहा
किलकारियों
से गुंजित आँगन नहीं रहा।
सूनी
पड़ी कलाई कंगन
नहीं रहा।
कैसी चली
चमन में अब तो
यहाँ पे आँधी।
भूखा यहाँ भरत
है नंगा पड़ा
है गाँधी।
रावण की
कैद में तो फिर से पड़ी
है सीता।
बंदी हैं
वेद सारे कीचड़
सनी है गीता।
चाँदी का बोल बाला।
सोने का
है उजाला ।
विद्या
हुई है विधवा साजन
नहीं रहा।
सूनी
पड़ी कलाई कंगन
नहीं रहा ।
रानी हुई है
दासी दासी बनी
है रानी।
शिशु हो गए हैं बुड्ढे आई नहीं जवानी।
बीती
है उम्र
सारी गुमनाम सी अजानी।
कविता सिसक रही है घायल पड़ी
कहानी।
पर्वत हैं
मुस्कराते ।
मस्ती के
गीत गाते।
मरुथल
को सींच दे
वह सावन नहीं
रहा।
सूनी
पड़ी कलाई कंगन
नहीं रहा ।
पीड़ा की
सुन्दरी अब सड़कों
पे नाचती है।
बस गिद्ध की
नजर तो बोटी ही जाँचती है।
इतनी थकी
है बेबस लाचार
हाँफती है।
चिट्ठी तो है
किसी की कोई ही बाँचती है।
पग हो गए
हैं घायल।
रोने लगी हैं पायल ।
विश्राम
दे सके वह
उपवन नहीं रहा।
सूनी
पड़ी कलाई कंगन
नहीं रहा ।
क्या बात दूध
की है आटे की बात कर
लो।
आँचल
के पात्र अब तो अश्कों से खूब भर लो।
यह दूध आज का है जी भरके
खूब पी लो।
सेहत का राज
इसमें क्षण-पल हजार जी लो।
मन के बहुत
हैं सच्चे।
तन के बड़े
हैं कच्चे।
बच्चे
बहुत हैं लेकिन बचपन नहीं
रहा।
सूनी
पड़ी कलाई कंगन
नहीं रहा।
कुर्सी
रहे
सलामत सालों हजार
जी लो।
रोकेगा कौन तुमको भर पेट
खून पी लो।
होगा हुआ
न तुम-सा भू पर
महान कोई।
लिख
दूँ कथा ‘मनीषी’लेकिन कलम है सोई।
मधुमास तो तुम्हीं
हो।
इतिहास तो
तुम्हीं हो।
काजल
जरा लगा दूँ
चन्दन नहीं रहा।
बच्चे
बहुत हैं लेकिन
बचपन नहीं रहा।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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