आधा ही कफ़न दे दो - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
आधा ही कफ़न
दे दो
लेकर
मेरे दोनों अंधों
को नयन दे दो।
मेरे
गीत कुँवारे है
पीड़ा की दुल्हन
दे दो।
चिन्ता के
चाँटों से व्यंग्यों
की मारों से ।
डोली को
खतरा है अपने ही कहारों
से।
सीता को बचा
पाये रक्षा को
लखन दे दो ।
मेरे
गीत कुँवारे हैं
पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
मेरा देश
भटकता है चिथड़ों
की वर्दी में।
छाती में दिए
घुटने फुटपाथ पे
सर्दी में।
हीटर वालों उनको
थोड़ी सी तपन
दे दो ।
मेरे
गीत कुँवारे हैं
पीड़ा की दुल्हन
दे दो।
भौरों ने
घूँघट को असमय ही
खेंचा है।
माली ने
कलियों को कच्चा
ही बेचा है।
मुरझाई कलियों
को बीता बचपन
दे दो।
मेरे
गीत कुँवारे हैं
पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
दाता
ही लूट रहा अपनी सौगातों
को।
ये वक्त लूटता है
सब रिश्ते- नातों को।
राखी की कसम
तुमको भैया को
बहन दे दो।
मेरे गीत कुँवारे
है पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
आग के अक्षर / पृष्ठ २५
हीरे-
मोती खाने वालों
से निवेदन है ।
भूखा अश्वत्थामा, प्यासा हर
आँगन है।
परहीन
पखेरू को रोटी
का गगन दे दो
।
मेरे
गीत कुँवारे है
पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
चाँदी के कटघरे
में सिन्दूर जला जाता।
उलझन लट सुलझाने
मंसूर जला जाता
चलने को
है बंजारा नन्हा
सा नमन दे दो।
मेरे
गीत कुँवारे हैं
पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
अर्थी के
पाँवों में सजती
पाजेब नहीं।
रेशम के कफ़न
में भी लगती है जेब
नहीं।
लाशों को
‘मनीषी’ अब
आधा ही कफ़न दे
दो।
मेरे
गीत कुँवारे है
पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
चाँदनी पराई है, ये धूप
नहीं अपनी।
‘करनी’
है वनवासी सत्ता में है ‘कथनी’।
पत्थर के हिये
में भी थोड़ी धड़कन दे दो ।
मेरे
गीत कुँवारे है
पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
आवारा आँसू
को, आशा की
संध्या को।
हिचकी की
फसलों को, खुशियों की
वंध्या।
आँगन की यशोदा
को नटखट मोहन
दे दो।
मेरे
गीत कुँवारे हैं
पीड़ा की दुल्हन
दे दो ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

Comments
Post a Comment