नवयुग का अभिनन्दन - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
नवयुग
का अभिनन्दन
आज आग शीतल हो
बैठी जलता है
चन्दन ।
आओ
मिलकर करें सभी
नवयुग का अभिनन्दन।
जीवन क्या है? अनुभव की सूखी -गीली रेती।
जिसके ऊपर सुख-दुख
की होती रहती खेती।
सुख
में मुस्काते सारे
दुख में
करते क्रंदन ।
आओ
मिलकर करें सभी
नवयुग का अभिनन्दन।
समय महाजन
लेकर कर में
बैठा है तखड़ी।
तोल- तोल देता
है सबको पाप-पुण्य-गठड़ी ।
कल्पवृक्ष
रो रहा स्वर्गवासी
अपना नन्दन ।
आओ
मिलकर करें सभी
नवयुग का अभिनन्दन।
तन मुस्काता, मजबूरी
में रोता ऐसे
मन।
नई - नई
शादी में जैसे
हो जाती अनबन ।
चिन्ताओं से दबे प्यार का कर
लूँ मैं वन्दन ।
आओ
मिलकर करें सभी
नवयुग का अभिनन्दन।
धर्म - दरोगा लिए हाथ में
मार रहा कोड़ा।
जीवन इससे
भाग रहा ज्यों लंगड़ाता
घोड़ा ।
टूट
रहे कच्चे धागे
से सारे ही
बन्धन ।
आओ
मिलकर करें सभी
नवयुग का अभिनन्दन।
आज हिन्दुओं के सिर
से गायब ऐसी
चोटी।
महँगाई में
भागे जैसे दूर-
दूर रोटी।
मुझको
भ्रम हो रहा
‘मनीषी’ भारत
है लन्दन ।
आओ
मिलकर करें सभी
नवयुग का अभिनन्दन।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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