कुछ दीपक उनके भी नाम - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
कुछ दीपक उनके भी नाम
कुछ दीपक इनके भी
नाम, कुछ दीपक उनके भी नाम।
बने नींव की ईंट खड़ा
है जिन पर अपना
राष्ट्र तमाम।
जिनको
भूल गई
आजादी महलों में आ जाते ही।
जैसे
भूल जाय पीहर को, दुलहन पति को पाते ही।
या
फिर कोई ठुकरादे सीढ़ी
को ऊपर जाते ही।
कोई छेद
करे थाली में
खाना खाते -खाते ही।
जिन पर आधारित अपनी
आजादी का ये भवन ललाम।
कुछ दीपक
इनके भी नाम,कुछ दीपक उनके भी नाम।
इतिहासों
ने भुला दिया जिनको
ऐसे बेशर्मी से।
जैसे शबनम झुलसे फिर मर
जाये थोड़ी गर्मी से।
महाकाव्य अपमानित हो कुछ शब्दों की
हठधर्मी से।
माँ का माथा
नीचा हो जैसे निज
पुत्र कुकर्मी से।
कभी कामना की न सुयश
की मरे देश
हित वीर अनाम।
कुछ दीपक
इनके भी नाम, कुछ
दीपक उनके भी नाम।
अपनी पत्नी की
माँगों में रोली
नहीं राख भर दी।
जिन बेटों ने भारत माँ
की ऊँची बहुत साख कर दी।
किस-किस का लें नाम,नहीं सारे गिनती
में आते है ।
कोशिश कर ली खूब मगर बाकी
फिर भी रह जाते है।
जो निष्कासित हुए ‘मनीषी’ वे
सब थे इस युग के राम।
कुछ दीपक इनके भी नाम, कुछ दीपक उनके भी नाम।
आजादी केवल न
मिली है, चर्खे,
तकली, खादी से।
प्राप्त किया है
इसे प्राण देने की खुली
मुनादी से।
आँख मिलाई कातिल से हँसकर,मुस्काकर खंजर से।
स्वतंत्रता का झरना
फूटा कई सदी
के बंजर से।
माँ को नहीं ‘मनीषी’ जिनने होने दिया
कभी नीलाम।
कुछ दीपक इनके
भी नाम, कुछ दीपक उनके
भी नाम।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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