घायल वेद पुराण हो गया - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
घायल वेद पुराण
हो गया
निशि -दिन
मैं चलता जाता
हूँ, सूरज
सा ढलता जाता
हूँ।
हाथों
को मलता जाता
हूँ, पीड़ा
सा पलता जाता
हूँ।
जिसको
लक्ष्य नहीं मिल पाया मैं
ऐसा अभियान हो गया।
सपनों का
अपमान हो गया।
सपने
सारे टूट गए
हैं, संगी
साथी रूठ गए
हैं।
मुझको
अपने लूट गए
हैं, दर्पण
लाखों फूट गए
हैं।
जिसके पेंदे छेद
हुआ है मैं
ऐसा जलयान हो गया।
चप्पू
लहूलुहान हो गया।
कुटिया
आज बहुत रोती
है, चिन्ता का
बोझा ढोती है ।
भूखी – अधनंगी
सोती है,
धरती में आँसू
बोती है ।
मार समय की
खाते - खाते मेरा दर्द
जवान हो गया ।
सब कुछ तीर-
कमान हो गया।
जलती
हैं उपवन की शाखें, टूट
चुकीं पक्षी की
पाँखें ।
बुझने
को आई हैं
आँखें, होती जाती
गर्म सलाखें ।
इतना दिल जल
चुका ‘मनीषी’ गीतों का
शमशान हो गया।
छन्दों का बलिदान
हो गया।
सत्य
रमाये बैठा धूनी,
कलियों की मुस्कानें
भूनी ।
फाग
मनाया जाता खूनी,
खुशियों की गलियाँ
है सूनी।
चाकू खा-
खाकर छाती पर
घायल वेद पुराण
हो गया ।
जहरीला इंसान हो
गया ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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