मेघ - निमंत्रण - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
मेघ - निमंत्रण
हे घन बरसो,
जम कर बरसो।
प्यासी भू की व्यथित
जवानी।
धरा
जल रही बनी पतंगा ।
सूख गई हैं
जमुना – गंगा।
आँधी रूपी दु:शासन
अब।
धरा – द्रौपदी ---करता नंगा।
बनकर मेघ,
कृष्ण अब सरसो।
लहरा दो आँचल फिर
धानी।
वह किसान
की बाला देखो,
तुमको ही
तो देख रही है।
दया करो हलधर पर जलधर,
माथे पर दुख
रेख रही है।
मौन
निमंत्रण पाकर आओ,
कर दो चुम्बन
से दीवानी।
कालिदास के
मेघदूत अब,
इतनी कृपा यहाँ भी कर
दो।
अंगारों से भरी
चिता पर,
कफ़न नहीं
दो आँसू धर दो।
तीर मार दो कुछ
वर्षा
के,
हो जाये फिर
खत्म कहानी।
‘इन्द्र सचिव’ जल कम है ऐसा,
प्यासों को
मत भाषण देना।
कुछ भी करो प्यास- पीड़ित को,
जल का
तुम कुछ राशन देना।
इससे स्नेह
मिले दीपों को –
दरिया को मिल
जाय रवानी।
भू के दुख से
सब दुख पाते।
जीव
मात्र भूखे रह
जाते।
रोना चाहें
बिलख -बिलखकर।
आँखों में
आँसू ना गाते।
आज
उधारा मिले ‘मनीषी’
अपनी
आँखों का यह पानी।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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