दीवाली - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
दीवाली
दीप की लघिमा
नहीं महिमा बताती
है दिवाली।
कर्म, कुंजी सफलता की
यह जलाती है दिवाली।
ध्यान रखना
घर कलह की बावली बनने न पाये।
एक माँ
के भाइयों में
युद्ध भी ठनने
न पाये।
यों न झटको
प्रीत की डोरी अधिक तनने न पाये।
कुपित होकर द्वेष -माँ नफरत कभी जनने
न पाये।
पितृ – आज्ञा पाल
बन कर्तव्य सिखलाती दिवाली।
त्याग
से उपभोग कर
सत्कर्म की ताली दिवाली ।
कौन कहता
मर गया रावण अभी भी जी रहा है।
भिन्न रूपों
में जगत का खून अब भी पी रहा है।
राम – रावण युद्ध
अंतर में सदा
से ही रहा है।
सत- असत्य प्रवृतियों का
द्वन्द्व मन में भी रहा है।
राम बन
लंकेश का
कर नाश दिखलाती दिवाली।
धूप बनकर खुशी की नित झिलमिलाती है दिवाली।
घृणा, कुंठा, द्वेष
का रावण हमें
ललकारता है ।
हृदय – बिल में सर्प -सा वह रोज ही फुफकारता है।
सद्गुणों को
नष्ट करता भावना
को मारता है।
हम समझ
पाते नहीं वह
रूप नूतन धारता है।
किरण बन तम- नाशकर, उपदेश दे जाती दिवाली।
झोंपड़ी
में दीप का
आलोक बन आती दिवाली।
कागजी पुतले जलाओ कुछ नहीं हल दीखता है।
शील का सूचक
नहीं यह हृदय की संकीर्णता है।
यदि जलाना
चाहते हो जला दो
दुश्वृतियों को।
तोड़ना यदि चाहते हो
तोड़ दो
दुख-भित्तियों को।
राम के वंशज
नहीं संकीर्ण बतलाती
दिवाली।
एकता से ही ‘मनीषी’ लहर बन जाती दिवाली
।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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