कुर्सियों की आड़ में - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
कुर्सियों की आड़
में
देश
पड़े चूल्हे में, राष्ट्र जाय
भाड़ में।
खेलते
शिकार सभी कुर्सियों की आड़ में।
आ गया कुबेरों
के घर में
भी टोटा है ।
सोने की
चिड़िया का सोना सब
खोटा है।
टूटते कहार
स्वयं दुलहन की डोली पर।
रंग
नहीं खूब खून बंटता
है
होली पर ।
बस्तियों
से चलके हम- तो
आ गये उजाड़ में।
खेलते शिकार सभी कुर्सियों
की आड़ में ।
बेच दिया
रोम-रोम छलिया हमदर्दों
ने।
काट दिया मानचित्र
झूठे नामर्दों ने।
साँस-साँस गिरवी है
आस-आस बन्दी है।
मरने की छूट खुली
बाकी पाबन्दी है।
दम नहीं ‘मनीषी’ अब शेर की दहाड़
में।
खेलते शिकार
सभी कुर्सियों की आड़
में।
बजते हैं पीड़ा
के घुँघरू अब पाँवों
में।
पहन -पहन खादी को चोर घुसे गाँवों
में।
सावन ये
कैसा है रोज
आग बरसे है।
पनघट पर आकर भी प्यासा मन तरसे है।
दुविधा
का ताला है
बन्द हर किवाड़ में।
खेलते
शिकार सभी कुर्सियों
की आड़ में।
आँचल में
दूध नहीं अश्कों की गंगा है।
भूखा है
बचपन तो यौवन
भी नंगा है ।
कंसों का
शासन है गूँगे
हैं बहरे हैं।
अंधे क्या
देखेंगे घाव बड़े
गहरे हैं।
आम नहीं लगते
हैं मित्र कभी
झाड़ में ।
खेलते शिकार
सभी कुर्सियों की आड़ में।
कत्ल किया
जाता है गाँधी के सपनों को।
दुलराते गैरों
को ठुकराते अपनों
को।
ज्ञान
आज लंगड़ा है धर्म भी तो अंधा
है।
अर्थी ही अर्थी
हैं मिलता ना
कंधा है।
अम्बर से
गिरकर हम
अटके हैं ताड़ में।
खेलते शिकार सभी कुर्सियों की आड़ में।
सभ्यता शराफत
के खेल सब घिनौने हैं।
मुट्ठी भर खेल
रहे हम सभी खिलौने हैं।
पर्वत थे
पहले हम किन्तु आज बौने हैं।
ओढ़ लो बिछा लो हम भूख के बिछौने हैं।
आजादी कैदी है आज
फिर तिहाड़ में।
खेलते शिकार सभी कुर्सियों की आड़ में।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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