साँस की सवारी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
साँस
की सवारी
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
निकली
जाय साँस की सवारी ।
दर्पणों से चेहरों
की ठन गई है
दुश्मनी ।
शब्द और अर्थ
की भी चल रही
तनातनी।
आँख और अश्क
की तो सन्धि जैसे हो
गई।
किसी को राह मिल गई
किसी की राह खो गई।
वक्त बन गया है
इक शिकारी।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
बुझ चुकी शमाँ परन्तु क्यों शलभ हैं जल
रहे।
शेर चुप पड़े
हैं आज तेंदुए
मचल रहे ।
कुछ कसाइयों के
हाथ फूल नित कुचल रहे।
मन्दिरों के
देवता भी रंग हैं
बदल रहे।
पड़ गया है
सोच में पुजारी ।
जिन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
मर रहे थे जाने किसने आके क्यों
बचा दिया।
छेड़ दिया, लूट
लिया शोर फिर
मचा दिया।
राह चलते आदमी के दिल में क्या
जँचा दिया।
भूख ने सभी
को बन्दरों सा है
नचा दिया ।
नाचने
लगा है खुद
मदारी।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी।
देह की दुकान
में है चोर
दर्द घुस गया।
साँस के मकान
में है गैर
मर्द घुस गया ।
स्वप्न - सुन्दरी का रोज
शील भंग हो रहा।
हार फूल – पत्तियों का
क्यों भुजंग हो रहा।
आदमी
है जहर की पिटारी।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी।
नाव कागजी है, भार खूब, तेज धार है ।
अब चमन
को आँख तक दिखा रही बहार है।
ओढ़नी में
आग है , कफ़न
भी तार-तार है ।
उँगलियों पे
डंक मारने लगा
सितार है ।
खा गई सभी को
दुनियादारी ।
जिन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
जागरण व
नींद क्या समझ
की एक बात है।
मरें तो सिर्फ
रात है जिएँ
तो फिर प्रभात है।
दिल में
दूर तक चुभे
न व्यर्थ तर्क- तीर
है।
सभी का
अन्त राख है
फकीर या अमीर है।
फिर भी सबको
अपनी चाम प्यारी।
ज़िन्दगी की
माँग है कुँवारी।
आदमी को भूल गया आदमी
का खून है।
हर दिमाग
पे चढ़ा क्यों
खून का जनून
है ।
कल्पना - कबूतरी
का खो गया
सकून है।
आज उड़ रही
घृणा
की हर जगह पे ऊन है।
आत्मा पे बोझ
बड़ा भारी ।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
गगन में, भू पे, जल
में, पल में रम रहा ये कौन है।
ग्रंथ बोलते
हुए हरेक जैसे
मौन है।
मौन है किसी
का अपने पास
का जवाब है ।
शराब तो
शराब है गुलाब
तो गुलाब है ।
सकपकायी
बुद्धि की बुहारी।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
भीख माँगते
सभी ही किन्तु
दंभ दान का ।
शीश नत सभी के
किन्तु गर्व आन
बान का।
जर्रा - जर्रा
कर्जदार ईश उस
महान का।
छत गगन, धरा है फर्श जिस
बड़े मकान का।
दाता वो हम
सभी भिखारी।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी।
दर्द देवता
है काव्य के
सृजन के वास्ते ।
तेज शूल आग से
भरे हैं इसके
रास्ते ।
सत्य की सलीब पे
लटक गया
वो तिर गया।
जो चढ़ा है
झूठ की
कुतुब पे नीचे गिर
गया।
वक्त ‘मनीषी’
बना जुआरी ।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
गम की
दास्तान का तो आदि
है न अन्त है।
ढूंढता
फिरे जवाब प्रश्न
यह ज्वलन्त है।
पतझड़ों से
डरके छिप गया
कहीं वसन्त है।
चन्द्र बिन्दु
भ्रष्ट होके बन
गया हलन्त है ।
लेखनी
बनेगी कब कटारी ।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी।
आईना अतीत
का बड़ी लजीज
चीज है।
वर्तमान दीखता
सभी को बत्तमीज
है।
भूतकाल रिक्त
पेट मर चुका
मरीज है।
पर भविष्य
के शरीर पर
नई कमीज है।
फेंक दो ये
नींद की खुमारी ।
ज़िन्दगी
की माँग है
कुँवारी ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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