महात्मा के मानस पुत्र - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’

                    महात्मा  के मानस  पुत्र
जिनके  शासन का  सूरज  भू  पर  न  कभी छिपता था।
जिनके यश   का  डंका  दशों  दिशाओं  में बजता था।
भारतीयता   जिनके  घर   में  पानी   तक  भारती  थी।
मातृभूमि   जिनके   घर   में  चौका  बर्तन  करती  थी।
भारत  माँ  बेड़ी,    हथकड़ियों   में  जकड़ी  बंदी  थी।
अपने सूरज  की  आभा  जुगनू  से   भी     मन्दी  थी।
उनकी   कृपा  दृष्टि  पर  सारा  जीवन  ही  निर्भर  था।
सदियों  से  स्वामी  थे  वे सारा  भारत    नौकर  था ।
जग  थर्राता,  सब  डरते  थे   ऐसी  थी  वह  आंधी ।
ऐसे  में  ही    मुक्तिदूत    बनकर    उतरे    थे   गाँधी।
सत्य  अहिंसा   के  दो  दीपक  आँखों  में  जलते थे ।
संयम,   शील,  त्याग, निष्ठां  दायें- बायें    चलते  थे ।
एक   इशारे   पर   उठता  था ज्वार  लोक   सागर  में।
समाविष्ट  थे  अनगिन  सागर  छोटी  सी   गागर  में।
अंगड़ाई    ली  तो   झनझना   उठीं   सारी    जंजीरें।
आत्मतेज  के  सम्मुख कुण्ठित पड़ी  सभी  शमशीरें।
देश  हुआ  आजाद  लगी  बजने  सुख  की  शहनाई।
एक  फूल  क्या  खिला  चमन  में  आई  थी  पुरवाई।
जिसके  लिए  जवानी  दी  उस  आजादी  को  देखो।
अपनी   आँखों  आजादी   की   बर्बादी   को  देखो।
गाँधी   बाबा    आकर    देखो   चेले   बने   निपूते ।
राजघाट   पर    रोज   चलाते   हैं   आपस   में  जूतें।
आप   अकेले  आना  पर  बकरी  को साथ न लाना।
भूखी   मर    जाएगी    नहीं     मिलेगा   पानी-दाना।
बकरी   क्या   है  ये नरभक्षी सब  कुछ  खा  जाते हैं।
                                                              
ये    बेताल   लहू  पी -पीकर  कव्वाली  गाते   हैं।
नाम   तुम्हारा   ले-लेकर   सब  चला  रहे  दूकानें।
टोह  ले  रहे  हैं  शिकार  की  बाँधे  कुटिल मचानें।
ईंट,  कोयला,  सरिया,  इंजन   बसें  पचा  जाते हैं ।
ये  शरीफ  बदमाश  स्वयं  को साफ  बचा  जाते हैं।
साबरमती   सिसकता  है   रोती  छोटी सी कुटिया ।
यही हाल यदि  रहा--- डुबा देगा ये  माझी लुटिया।
मरे  पड़े  थे   पहले   ही  अब ज्यादा  मार  गई  है।
रामराज्य  की  मधुर  कल्पना  स्वर्ग  सिधार गई है।
राम नहीं है राज्य--- राज्य है  जली कल्पना बाकी।
डूब   रहा  है   देश   समूचा    भूल    गए  तैराकी।
हिन्दी  को   जैसा  छोड़ा  था  वैसी  की  वैसी  है ।
शिष्य  मण्डली  करती  उसकी ऐसी  की  तैसी  है।
पटरानी    तेरे   आँगन   में   बाँदी   थी,  बाँदी  है।
आज   विदेशी  बंजारन  की  खूब  हुई  चाँदी  है ।
कुछ  सनकी  तेरी  समाधि  गंगा-जल  से  धोते है।
भीतर- भीतर   तो   हँसते   हैं   ऊपर   से  रोते  हैं।
दुनिया  की    नजरों  में  तो   हैं पक्के  गाँधीवादी।
चोरों  को  अब  शरण  दे  रही  है  तेरी यह खादी।
रोटी  नहीं  बढ़ा  दिन-पर-दिन  ये  सब जेल रहे हैं।
समझा  लो  अपने चेलों को  खुलकर  खेल रहे हैं।
वरना    नाथूराम     अनेकों     पैदा    हो   जायेंगे।
इनके  पाप  इन्हीं  के   गर्म  लहू  से  धो    जायेंगे ।
सच   कहता हूँ भूखा मरता सब कुछ कर सकता है।
कुछ को लगा ठिकाने आखिर खुद भी मर सकता है।
यही हाल यदि रहा  तो  पनघट  मरघट  हो जायेगा।
                                            
सच कह रहा ‘मनीषीसब कुछ चौपट हो जायेगा।
अधिक  कहूँगा  तो  शायद चेलों को बुरा लगेगा।
सच्चा  शब्द-पिटारा  उनको  तीखा  छुरा  लगेगा।
जाता  हूँ  इस वक्त अभी तो  शेष बात  फिर  होगी।

काली  रात  छँटेगी आखिर  पुनः  प्रात  फिर  होगी।

- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
 [ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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