भिखारियों का क्या होगा? - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
भिखारियों का क्या
होगा?
रक्षक ही
जब शरणागत भक्षक बन
जाये,
तब कातिल हिंसक शिकारियों का क्या क्या होगा?
संन्यासी ही जब जुआ खेलने लग
जाएँ,
तब छोटे- मोटे जुआरियों का
क्या होगा?
कुछ प्रश्न
लिए आया हूँ
भींचे मुट्ठी में,
कुछ शंकाओं
के नाग मुझे
नित डसते हैं।
लंका की बात
नहीं करनी है आज
मुझे ,
क्यों रावण
अनगिन जनकपुरी में बसते हैं।
ओ राम, भरत ! उत्तर दो
मेरे प्रश्नों का ,
अपहरण लखन क्यों
सीता का करवाता है?
क्यों बैठे मूक
‘मनीषी’सारे देख
रहे ,
क्या जनक सुता से
कुछ न तुम्हारा नाता है?
देवता
नये नित रंग
बदलने लग जायें---
तो श्रद्धा – आकुल पुजारियों का क्या होगा?
कोई अपंग
मजबूरी के बदले थोड़ी,
सुविधा माँगे
तो बात समझ में आती है।
बेमौसम ठूँठ
पेड़ पर बैठ
दुपहरी में,
भिखमंगी कोयल
कैसी माँग सुनाती है।
पुरवाई ने
ली ओढ़ आग अपने तन पर,
अंबर से भी
विष की बरसात हो रही है।
फेरों के बाद
सजे मंडप में टूट पड़ी---
बिजली, दूल्हे पर,
कुल बारात रो रही है।
जब धन कुबेर
ही भीख माँगने लग
जायें---
तो
फुटपाथों के भिखारियों
का क्या होगा?
मैं रोते
देख रहा हूँ
रोज तिरंगे को ,
गंगा
की सिसकी
साफ़ सुनाई पड़ती है।
बच्चों
को भूख नग्नता द्रुपद सुताओं को,
हर
तरफ नाचती मौत दिखाई पड़ती है।
युवकों को अंतहीन सड़कें, टूटी चप्पल,
आशा को रेगिस्तान
दिखाई देता है ।
उनको दिखता
होगा नन्दन अपना भारत,
मुझको तो
कब्रिस्तान दिखाई देता
है।
नेता ही जब
डुगडुगी बजाने लग
जायें----
तब पेशे वाले
मदारियों का क्या
होगा?
संन्यासी ही
जब जुआ खेलने
लग जायें---
तब
छोटे-मोटे जुआरियों का
क्या होगा?
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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