दो भिखमंगे - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
दो
भिखमंगे
दो भिखमंगे नंग धड़ंगे, देखे
मैंने माँग रहे
हैं ।
खुद
सूली पर लटके
हैं, औरों
को उस पर टांग रहे हैं।
आँखों में रोता वृन्दावन, आनन पर करुणा
की धारा।
बुझे
हुए सपनों के सूरज
लिए पड़ा है इक बेचारा ।
फटी
लँगोटी, सूखी बोटी, तन जर्जर
है औ’ नंगा है।
उड़ने से
मजबूर विहग सा
आँखों में जमुना -गंगा है।
चलता-फिरता जलता मरुथल,तप्त श्वास है,मुख
उदास है।
पथराई आँखों से
देखे , दो दानों की
उसे आस है ।
एक
नहीं ऐसे अनेक
जो सड़कों पर
दे बांग रहे है ।
खुद
सूली पर लटके
हैं, औरों
को उस पर टांग
रहे है।
दूजा नहीं माँगता हाथ पसारे
सड़कों पर राहों में।
सुख- सुविधा हैं नित्य
थिरकती नाच रही उसकी बाँहों में।
बीबी औ’ बच्चे हैं
उसके कोठी,बंगला और कार हैं ।
अच्छा सा
व्यापार चल रहा पर आदत के गुनाहगार हैं।
सिसक रहे यौवन
की उसको बोलो भैया क्या चिन्ता हैं।
क्योंकि कमाऊ बेटा
उसका सुन्दर हैं औ’ अभियन्ता हैं।
एक नहीं ऐसे लाखों हैं, जो दहेज नित माँग रहे हैं।
खुद सूली पर लटके हैं औरों को उस पर टांग रहे हैं।
एक सड़क पर खड़ा दीनता के
स्वर में कर फैलाता है।
पथिक दया करके उसको थोड़ी सी भिक्षा दे जाता है ।
चलता रहता यही सिलसिला
प्रातः से संध्या तक भाई।
बच्चे, बुड्ढ़े, युवक
दे रहे पुत्रवती वन्ध्या औ’ माई।
केवल पैसा, दो पैसा दे दो
दाता के नाम दीन को।
भूख -प्यास से मरा जा
रहा दे दो जीवन -दान मीन को।
आग के अक्षर / पृष्ठ ३३
गला फाड़कर दिखा ‘मनीषी’ करतब नित्य छलाँग रहे हैं।
खुद सूली पर लटके
हैं
औरों को उस पर टांग रहे
हैं।
तोंदल तन, फूले कपोल
ओढ़े सिर पर काली टोपी है।
घड़ी हाथ में छड़ी
साथ में बाँधे
ब्रासलेट धोती है।
बात कर रहा है रिश्ते की कम कहने पर आँख दिखाता।
आस करोड़ों की करता
है पेट भर रहा
पर गुर्राता ।
उसको मत इन्सान कहो तुम वह शरीफ
गुण्डा डाकू है।
मजबूरों का गला काटता
बिना शब्द ऐसा चाकू है ।
कर में
लिए दहेज – कुल्हाड़ा प्रेम वृक्ष
को छांग रहे हैं।
खुद सूली
पर लटके हैं
औरों को उस पर
टांग रहे है।
दोनों चित्र
नाचते रहते हैं
मेरी आँखों के
आगे ।
इक मेरी
करुणा को लेता खींच जोड़ सम्बन्धी धागे।
पहला दुखिया, भिक्षा पर आधारित
जीवन बेढंगा है।
और दूसरा सोने
के आभूषण लादे
भी नंगा है।
कोई और नहीं है वह खुद ही बेटे का बाप
खास है।
धन पर बैठ कुण्डली मारे वह जहरीला साँप पास है।
कुएँ,
धर्मशाला बनवाकर खेल
धर्म का साँग
रहे हैं।
खुद सूली
पर लटके हैं औरों
को उस पर टांग
रहे हैं ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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