परशु को संभालो - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
परशु को
संभालो
उठो
ब्रह्म पुत्रो !
परशु को सँभालो।
जो
बिगड़ी है किस्मत
उसे फिर बना लो।
मिटाती जो
पापों को, शमशीर
तुम हो।
पतित पावनी
पुण्य तस्वीर तुम हो।
सदा जीत की
ठोस तदबीर तुम
हो।
सफल विश्व
की मंजु तकदीर
तुम हो।
उठो
फिर विजय को
गले से लगा
लो।
जो
बिगड़ी है किस्मत
उसे फिर बना लो।
उठो तुम
अगर तो ये
शमशान गाये।
पहन पाँव घुँघरू
ये तूफान गाये ।
जगो तो गगन, भू पे
इन्सान गाये ।
धरा पर उतर
वेद - भगवान गाये।
सृजन कर ‘मनीषी’ प्रलय पग बंधा
लो।
जो
बिगड़ी है किस्मत
उसे फिर बना
लो।
सदा
न्याय -पथ के रहे
तुम हो राही।
अभी तक है
इतिहास देता गवाही।
कि ला दी थी दुष्टों पे
तुमने तबाही।
रहे पाप से
तुम तो लड़ते
सदा ही।
अनाथांसुओं
से सगाई करा
लो ।
जो
बिगड़ी है किस्मत उसे फिर बना लो।
उठो
जिन्दगी का सनम
खो गया है।
अँधेरा बड़ा ही
गहन हो गया
है ।
तपस्वी क्यों तेरा ये ताप सो गया है ।
क्यों राहों में
काँटे कोई बो गया
है।
सारस्वत मोहन ‘मनीषी’/पृष्ठ ६४
परशु को
स्व कन्धों पे
फिर से बिठा लो।
जो
बिगड़ी है किस्मत
उसे फिर बना लो।
ये लाशों
पे बोलो कफ़न
क्यों नहीं है ।
मरुस्थल में
कोई चमन क्यों
नहीं है ।
ये मेरा पुराना
वतन क्यों नहीं
है ।
बता शारदा
को नमन क्यों
नहीं हैं ।
धरा को बना
गेंद फिर से उछालो।
सदाचार
को पास अपने
बिठालो ।
उठो ब्रह्मपुत्रों परशु
को सँभालो।
जो बिगड़ी है किस्मत उसे फिर बना लो।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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