वतन तुम्हारा है - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
वतन
तुम्हारा है
तुम्हीं तो
पत्थर हो यहाँ की नींवों के, हमारा इसमें क्या भवन तुम्हारा है।
कहे कोई कुछ भी असल है बात यही ,तुम्हीं ने खून दिया
वतन तुम्हारा है।
भुला
न
पायेंगे तुम्हारी कुर्बानी ।
हर
एक जीवन का
कदम था तूफानी ।
तुम्हारी बातों
में गज़ब का
मीठापन ।
तुम्हारी चितवन
में निराला तिरछापन ।
तुम्हीं ने
फाँसी को विहँस के चूमा था।
तुम्हारे गीतों
से जमाना झूमा
था।
तुम्हें
बता क्या दूँ
शहीद भारत के -- तुम्हारे चरणों
में नमन हमारा है ।
कहे कोई
कुछ भी असल है बात यही,तुम्हीं ने
खून दिया वतन तुम्हारा है।
तुम्हीं ने काटी थी
वतन की हथकड़ियाँ।
तुम्हीं ने
छोड़ी थी हँसी की फुलझड़ियाँ।
तुम्हारे आने
से बाहार आई
थी।
सभी ही कंठों
ने ग़ज़ल सी
गई थी।
मशाल हाथों में
अँधेरा भागा था।
जगे थे तुम
ऐसे वतन ही
जागा था।
लहू का घृत डाला,सुगन्ध सांसों की
--तुम्हीं ने समिधा दी हवन तुम्हारा है।
तुम्ही तो पत्थर हो यहाँ की नींवों
के, हमारा इसमें क्या भवन
तुम्हारा है।
तुम्हारे
सपनों को किसी
ने खा डाला।
लिखा तो तुमने था
किसी ने
गा डाला।
बड़े घिनौने
हैं यहाँ पे कुछ
चेहरे।
हुए हैं हम गूँगे बने
हैं वे बहरे ।
किसी से क्या कह दें किसी से क्या सुन लें।
ये दिल में आता है कि सिर को हम धुन लें।
तुम्हारे सपनों
की है लाश तक नंगी--हमारे हाथों
में कफ़न तुम्हारा
है।
कहे कोई कुछ भी असल है बात यही, तुम्हीं ने खून दिया वतन तुम्हारा है।
कलम कलम न रहे, वो आग बन जाये।
कुचल के रख
दे झट जो नाग तन जाये।
तुम्हारी राख
यहाँ पर पराग हो जाये ।
सभी की मायूसी
सुहाग हो जाये ।
खिजाँ खिजाँ न रहे,
कली कली न रहे।
नली नली न रहे, गली गली न
रहे।
दिलों- के दरवाजे खुलें ‘मनीषी’ सब, तुम्हीं
तो माली हो चमन तुम्हारा है।
लहू का घृत डाला, सुगन्ध साँसों की -तुम्हीं ने समिधा दी हवन तुम्हारा है।
डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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